इस हरे भरे वन में क्यूँ अब मन लगता नही
गुलों पर शबनम की बूंदें आँखों को ठंडक देती नही
हरी दूब पर नंगे पाँव चलूँ तो अब ये सुहाता नही
वज़ह क्या तलाशूँ खुद में खुद ही क्यूँ नज़र आता नही
प्रकृति की छटा तो ऐसी ही थी अपने वतन की
फ़िर क्यूँ ये परिंदों का उड़ना दिल को लुभाता नही
चांदनी आती तो है पर तारों का झिलमिलाना
यूँ चाँद को चकोर का निहारना अब दिल में समाता नही
रास्ते बहुत लम्बे से है आसमान दूर तलक फैला
बादलों का यूँ उस पर तैरना अब बेचैन करता नही
झील के ठहरे पानी सा मन भी कहीं ठहरा सा लगता है
अब ये झरनों का गिरना बहना क्यूँ अरमा कोई जगाता नही
किरने भी झरोखों तक आती हैं सौ बातें कर लौट जाती हैं
हवा की वो भीनी भीनी खुशबु भी क्यूँ मन को महकाता नही
वो नीम की गहरी ठंडी छावं तो है अब भी आँगन में
हर शाम की तरह अब परिंदों का झुण्ड क्यूँ इधर आता नही
सारा
गुलों पर शबनम की बूंदें आँखों को ठंडक देती नही
हरी दूब पर नंगे पाँव चलूँ तो अब ये सुहाता नही
वज़ह क्या तलाशूँ खुद में खुद ही क्यूँ नज़र आता नही
प्रकृति की छटा तो ऐसी ही थी अपने वतन की
फ़िर क्यूँ ये परिंदों का उड़ना दिल को लुभाता नही
चांदनी आती तो है पर तारों का झिलमिलाना
यूँ चाँद को चकोर का निहारना अब दिल में समाता नही
रास्ते बहुत लम्बे से है आसमान दूर तलक फैला
बादलों का यूँ उस पर तैरना अब बेचैन करता नही
झील के ठहरे पानी सा मन भी कहीं ठहरा सा लगता है
अब ये झरनों का गिरना बहना क्यूँ अरमा कोई जगाता नही
किरने भी झरोखों तक आती हैं सौ बातें कर लौट जाती हैं
हवा की वो भीनी भीनी खुशबु भी क्यूँ मन को महकाता नही
वो नीम की गहरी ठंडी छावं तो है अब भी आँगन में
हर शाम की तरह अब परिंदों का झुण्ड क्यूँ इधर आता नही
सारा

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