बुधवार, 6 जून 2012

मिली सज़ा.................!

क्यों दो पल भी बहार ठहरी नहीं घड़ी आ गई तेरे जाने की
ख़ता मेरी कुछ भी नहीं फिर भी मिली सज़ा दस्तूर निभाने की
आदत कैसी अपनी मासूम सी हर कहानी तुझे सुनाने की
लौट रही हूँ अब मैं भी दे के दुआ तुझे ताउम्र सलामत रहे अदा तेरी मुस्कुराने की




न चाह तुझसे  मिलने  की ना चाह  तुझ  से  कुछ भी पाने  की
तड़प  रह  गई है बस अब तेरे होठों  पर मुस्कराहट  बिछाने की
गम  दिए है हमने तुझको  बहुत  अरमान  हैं  बस उसे  समेट लाने  की
कतरा  भी अश्क  का जो  तेरी आँखों  में  आया  तो  इधर  समंदर  बहाने  की


गुनाहगार  सी लगती  है जिंदगी अपनी चाह नहीं अब कुछ भी तुझसे जताने  की
अरमान जलें  या  बर्फ  की ठंडी  आँहों  तले रहें  भूल  गई मैं  हर अदा  सताने  की
तुम बिन  दिन  कैसे ढला  कैसे बीती रात   नहीं बची  अब बात  कुछ तुझसे कह जाने की
ज़ख्मो  को सीने  में ही दफ़न  कर  दिया अब नहीं बाकी कोई दस्तूर-ए-रस्म निभाने की


जलता दिया हूँ मैं  अपने ही मज़ार की करूँ क्या रोशन अब कोई और दयार  जहां की
समेट  लिया  है हमने अपने दामन को भी नहीं रही चाह भी अब किसी और दुआ-बद्दुआ की
तकदीर का फ़साना है जन्मो तक निभाना है फिर दरमियाँ जगह कंहा किसी नशात की
'तुम' लौट आओ अब तेरे काँधे पर सर रख पहले सी मुझे चाह हो रही है बस रोते जाने  की

-----सारा

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