बुधवार, 6 जून 2012

गीली सी नूर की बूंदें !!

गीली सी नूर की बूंदें भी धुंधला अक्स तेरा ही निहारा करती हैं
शब्-ए-तसव्वुर में और शाम-ए-बज़्म में तेरी ही बातें हुआ करती  हैं 
तिनकों  के  इस  घरोंदें  में  कच्ची-पक्की कुछ यादें  सजी  रहती  हैं
वक़्त के इस घनेरे जंगल में तेरे ही ख्वाबों के जुगनू चमका  करते  हैं



ये मखमली अँधेरे अज़ीज़ हुए हैं हमे चांदनी तुझको नज़र करते हैं
गरीब की झोली में दुआवों के सिवा क्या हवाओं के हाथ तेरे नाम किया करते हैं
वक़्त का ये खंज़र दिल पर यूँ नश्तर चलाता है मुस्कुराते लबों पर खमोशी  बसेरा करते हैं
हाथों में हाथ लिए जब राहों पर हम साथ होते है दरमियान हमारे आप ही आप आ बसते हैं



पौ फूटती है जब किरणों की एक नई उम्मीद से लबरेज़ नादान दिल सौ अरमान सजोते हैं  
शब् भर जलती शमा के बुझते लव के साथ हर उम्मीद की किरण भी दम अपना तोड़ जाती है
गए दिनों को खबर कंहा मेरी  ना-उम्मीद थे जिनसे ही पहलु में उनकी ही राह मेरे अब जाते हैं 
कुछ लम्हात हम भी गुम रहेंगे किसी जहां में तलाश में न जाने क्यों वो बीते जुगनू चले आते हैं



तुम भी गुम अपनी दुनिया में हमने भी चुन ली  है राह जो उजड़े चमन की ओर जाते हैं
बरसों से नाता नहीं रहा जिससे कदम मजबूर ही सही थम-थम के उसी ओर आगे बढते जाते हैं
खुशबू यंही कंही रह जाएगी मेरी हम तो मुरझाये गुलो से दरो दीवार उनका सजाने को अब चलते जाते हैं
या रब ! क्या लिखा है तूने तकदीर में मेरी खमोशी और ये जलते अंगारे शौक़ से अब हम भी राही उसी राह के हुए जाते हैं


-------------सारा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें