बुधवार, 6 जून 2012

साज़-ए-जिंदगी बजाएं कैसे.............!!!


जिन्दगी इतनी हसीं है तो इसे दिल के सफे पे सजाएं कैसे
जब दिल रोये तो होठों पर मुस्कराहट बिछाएं कैसे
हज़ार तूफ़ान हो दिल में तो सुकून से नाता निभाए कैसे
शबनम की बूंद ठहरती है कंहा उसे फूलों के बीच छुपायें कैसे



हाल-ए-दिल भी अजीब है इसे छुपायें कैसे बताएं कैसे
खैरियत तो उसकी मिल जाती है सपनों में भी पर इस दिल को समझाएं कैसे
बदला बदला सा है वो भी कुछ समझ  ये हम उसे समझाएं कैसे
ज़ख़्म गहरे हैं उसके अनजान नहीं हम इस मर्म का उसे एहसास दिलाएं कैसे



रब देता रहा सलामती उसकी किस्तों में रात तड़पती रही उसे सुलाएं कैसे
दुनिया की भीड़ में वो मुझे क्यों मिला ये सवाल अब सुलझाएं कैसे
काफिला दिल का था सुकून से गुजरने को वो राह में ऐसे मिला क़ि अमन की बस्ती बसायें कैसे
हज़ार सवालो से घिरा दिल बस ये एक सवाल करने का अब हौसला लायें कैसे



चुपके से जाना उसका और दबे पावँ आना उसका निशाँ इस दिल पे उसे दीखाएं कैसे
वो ज़ख्मो की तीमारदारी में हम लाचार मरहम लिए इस दिल पर फिर ज़ख़्म खाए कैसे
निशाँ जो पड़े हैं राह में सजदे करती हूँ या रब! उससे अब रुखसती की रस्म निभाए कैसे
जार-जार हुआ है दिल का तार भी अब इन टूटे अल्फाजों से नगमो को सजाए और साज़-ए-जिंदगी बजाएं कैसे

सारा

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